BY SATISH KUMAR
गाँधी के आदर्शों के मापदंड ऐसे हैं, जिसके लिए सांसारिक मोह त्यागने की आवश्यकता पड़ेगी, जिसकी बलि आज के समय में कोई नहीं देना चाहता। आज के भौतिकवादी युग में गाँधी के विचार ही नहीं बल्कि खुद वे भी ऑउटडेटेड प्रतीत होते हैं! बहुल भारतीय जनमानस की चेतना वैसी नहीं विकसित हुई जो उनके विचारों को अंगीकृत करें। ऐसे में पहली और अनिवार्य शर्त ये है कि भारतीय शिक्षा प्रणाली में व्यापक बदलाव किये जाएं ताकि कुपढ़ों का समुचित विकास हो और वे अपनी चेतना और विवेक के मार्फत किसी निर्णय पर पहुँचे न कि उग्र सम्वेदना तथा रूढ़िवादी-अतिक्रमणकारी विचारधारा के बलबूते। यहाँ अतिक्रमणकारी विचारधारा कहने का ये तात्पर्य है कि कोई भी ऐसी विचारधारा जिसमें से बाहर निकलकर स्वतंत्र रूप से सोचने में बाधा पहुँचे, जिसकी गिरफ्त में आप इस कदर आ जायें कि आपकी तर्कशक्ति ही क्षीण पड़ने लगे।
मोहनदास करमचंद गाँधी के ऊपर स्वतंत्रता संग्राम के एक वीर सिपाही शहीद-ए-आजम भगत सिंह की फाँसी रोकने के लिए पूरी कोशिश नहीं करने का लांछन लगाया जाता है। ऐसा जिस वजह से किया जाता है उसके कारण कुछ यूँ हैं - 17 फरवरी 1931 को वायसराय इरविन और गाँधी जी के बीच बातचीत हुई और 5 मार्च 1931 को एक समझौता हुआ, जिसे गाँधी-इरविन समझौता नाम से जाना जाता है। इस समझौते के तहत अहिंसक तरीकों से विरोध करने वाले सभी क्रांतिकारियों को छोड़ने की बात हुई। मगर भगत सिंह की माफी की शर्त नहीं मानी गई। भगत सिंह अपनी माफी के सख्त खिलाफ थे, इसका प्रमाण भी इतिहास में मिलता है।
गाँधी के आदर्शों के मापदंड ऐसे हैं, जिसके लिए सांसारिक मोह त्यागने की आवश्यकता पड़ेगी, जिसकी बलि आज के समय में कोई नहीं देना चाहता। आज के भौतिकवादी युग में गाँधी के विचार ही नहीं बल्कि खुद वे भी ऑउटडेटेड प्रतीत होते हैं! बहुल भारतीय जनमानस की चेतना वैसी नहीं विकसित हुई जो उनके विचारों को अंगीकृत करें। ऐसे में पहली और अनिवार्य शर्त ये है कि भारतीय शिक्षा प्रणाली में व्यापक बदलाव किये जाएं ताकि कुपढ़ों का समुचित विकास हो और वे अपनी चेतना और विवेक के मार्फत किसी निर्णय पर पहुँचे न कि उग्र सम्वेदना तथा रूढ़िवादी-अतिक्रमणकारी विचारधारा के बलबूते। यहाँ अतिक्रमणकारी विचारधारा कहने का ये तात्पर्य है कि कोई भी ऐसी विचारधारा जिसमें से बाहर निकलकर स्वतंत्र रूप से सोचने में बाधा पहुँचे, जिसकी गिरफ्त में आप इस कदर आ जायें कि आपकी तर्कशक्ति ही क्षीण पड़ने लगे।
मोहनदास करमचंद गाँधी के ऊपर स्वतंत्रता संग्राम के एक वीर सिपाही शहीद-ए-आजम भगत सिंह की फाँसी रोकने के लिए पूरी कोशिश नहीं करने का लांछन लगाया जाता है। ऐसा जिस वजह से किया जाता है उसके कारण कुछ यूँ हैं - 17 फरवरी 1931 को वायसराय इरविन और गाँधी जी के बीच बातचीत हुई और 5 मार्च 1931 को एक समझौता हुआ, जिसे गाँधी-इरविन समझौता नाम से जाना जाता है। इस समझौते के तहत अहिंसक तरीकों से विरोध करने वाले सभी क्रांतिकारियों को छोड़ने की बात हुई। मगर भगत सिंह की माफी की शर्त नहीं मानी गई। भगत सिंह अपनी माफी के सख्त खिलाफ थे, इसका प्रमाण भी इतिहास में मिलता है।
गाँधी के आदर्शों के मापदंड ऐसे हैं, जिसके लिए सांसारिक मोह त्यागने की आवश्यकता पड़ेगी, जिसकी बलि आज के समय में कोई नहीं देना चाहता। आज के भौतिकवादी युग में गाँधी के विचार ही नहीं बल्कि खुद वे भी ऑउटडेटेड प्रतीत होते हैं! बहुल भारतीय जनमानस की चेतना वैसी नहीं विकसित हुई जो उनके विचारों को अंगीकृत करें। ऐसे में पहली और अनिवार्य शर्त ये है कि भारतीय शिक्षा प्रणाली में व्यापक बदलाव किये जाएं ताकि कुपढ़ों का समुचित विकास हो और वे अपनी चेतना और विवेक के मार्फत किसी निर्णय पर पहुँचे न कि उग्र सम्वेदना तथा रूढ़िवादी-अतिक्रमणकारी विचारधारा के बलबूते। यहाँ अतिक्रमणकारी विचारधारा कहने का ये तात्पर्य है कि कोई भी ऐसी विचारधारा जिसमें से बाहर निकलकर स्वतंत्र रूप से सोचने में बाधा पहुँचे, जिसकी गिरफ्त में आप इस कदर आ जायें कि आपकी तर्कशक्ति ही क्षीण पड़ने लगे।
मोहनदास करमचंद गाँधी के ऊपर स्वतंत्रता संग्राम के एक वीर सिपाही शहीद-ए-आजम भगत सिंह की फाँसी रोकने के लिए पूरी कोशिश नहीं करने का लांछन लगाया जाता है। ऐसा जिस वजह से किया जाता है उसके कारण कुछ यूँ हैं - 17 फरवरी 1931 को वायसराय इरविन और गाँधी जी के बीच बातचीत हुई और 5 मार्च 1931 को एक समझौता हुआ, जिसे गाँधी-इरविन समझौता नाम से जाना जाता है। इस समझौते के तहत अहिंसक तरीकों से विरोध करने वाले सभी क्रांतिकारियों को छोड़ने की बात हुई। मगर भगत सिंह की माफी की शर्त नहीं मानी गई। भगत सिंह अपनी माफी के सख्त खिलाफ थे, इसका प्रमाण भी इतिहास में मिलता है।
गाँधी के आदर्शों के मापदंड ऐसे हैं, जिसके लिए सांसारिक मोह त्यागने की आवश्यकता पड़ेगी, जिसकी बलि आज के समय में कोई नहीं देना चाहता। आज के भौतिकवादी युग में गाँधी के विचार ही नहीं बल्कि खुद वे भी ऑउटडेटेड प्रतीत होते हैं! बहुल भारतीय जनमानस की चेतना वैसी नहीं विकसित हुई जो उनके विचारों को अंगीकृत करें। ऐसे में पहली और अनिवार्य शर्त ये है कि भारतीय शिक्षा प्रणाली में व्यापक बदलाव किये जाएं ताकि कुपढ़ों का समुचित विकास हो और वे अपनी चेतना और विवेक के मार्फत किसी निर्णय पर पहुँचे न कि उग्र सम्वेदना तथा रूढ़िवादी-अतिक्रमणकारी विचारधारा के बलबूते। यहाँ अतिक्रमणकारी विचारधारा कहने का ये तात्पर्य है कि कोई भी ऐसी विचारधारा जिसमें से बाहर निकलकर स्वतंत्र रूप से सोचने में बाधा पहुँचे, जिसकी गिरफ्त में आप इस कदर आ जायें कि आपकी तर्कशक्ति ही क्षीण पड़ने लगे।
मोहनदास करमचंद गाँधी के ऊपर स्वतंत्रता संग्राम के एक वीर सिपाही शहीद-ए-आजम भगत सिंह की फाँसी रोकने के लिए पूरी कोशिश नहीं करने का लांछन लगाया जाता है। ऐसा जिस वजह से किया जाता है उसके कारण कुछ यूँ हैं - 17 फरवरी 1931 को वायसराय इरविन और गाँधी जी के बीच बातचीत हुई और 5 मार्च 1931 को एक समझौता हुआ, जिसे गाँधी-इरविन समझौता नाम से जाना जाता है। इस समझौते के तहत अहिंसक तरीकों से विरोध करने वाले सभी क्रांतिकारियों को छोड़ने की बात हुई। मगर भगत सिंह की माफी की शर्त नहीं मानी गई। भगत सिंह अपनी माफी के सख्त खिलाफ थे, इसका प्रमाण भी इतिहास में मिलता है।
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